खत्म होती रिश्तों की मर्यादा
आज रिश्तों की मर्यादा खत्म होती जा रही है| लोगो की इसी सोच के कारण अपनो पर भी विश्वास करना बहुत कठिन हो गया है|आज के दौर में लोगों की हरकतों से ये समाज भी बहुत शर्मसार हो गया है ऐसा लगता है कि कलयुग सर चढ़ कर नाच रहा है बच्चा जब बोलने लगता है तो उसे रिश्तों के बारे मे बार बार बुलवाते और बताते है कि ये चाची - चाचा ,बुआ- ,दादी- बाबा, भाई - बहन इत्यादि |पर आज इन रिश्तो की कोई कद्र नही | आज लोग इतने हवसी हो गये कि अपनी बहन तक को अपनी हवस का शिकार बना डाला वो उन रिश्तों को भूल गये कि यदि समाज मे इस बात को जाना तो वह क्या जवाब देंगे | आज शायद करीब छः महीने पहले से हिम्मत कर रहा हूॅ पर आज इस पर लिखने की हिम्मत कर पाया | ये लेख पढने मे शायद अटपटा लगे पर जो भी लिखा गया है वह एक कटु सत्य है अपने ही भाई से शायद कोई भी बहन को ये उम्मीद नही होगी | जो समाज के सामने तो भाई है पर पर्दे के पीछे हवसी कुत्ता | आज के दौर में ये सुनना और जानना बहुत ही जरूरी है | लड़की अपने बचपन के मित्र है जो अच्छे दोस्त है और वह सिर्फ एक अच्छे दोस्त ही होते है ना कि लिव इन रिलेशनशिप मे | वो दोनो इस रिश्ते को अच्छे से जी रहे होते है एक दिन अचानक ये बात घर पर कुछ लोगो को मालूम पड़ जाती है और वह उस रिश्ते को गलत समझ कर सबको ( परिवार के सदस्यों के ) बताने की बात कहते है क्योंकि माॅ के गुजर जाने के कारण पापा ही उसका सब कुछ है और वह इस बात को उन्हे नही बताना चाहती और घर के सदस्यों को जो सच है वह समझाने की कोशिश करती है पर घर के सदस्यों के द्वारा उस को गलत ही समझा जाता है और उस पर अपनी भड़ास निकालने लगते है | उसे उन सबके द्वारा बहुत ही गन्दे अपशब्द सुनने पडते है और उसे माॅ के मरने का दोष देते है शायद उसे इस बात का अन्दाजा भी नही था कि घर के लोग उसके प्रति ऐसी गन्दी सोच रखते हैं कुछ समय घर की इन ओछी बातो की आदत उसने डाल ली और अपने मित्र से अपनी मित्रता को खत्म कर लेती है कुछ समय बीता ही था कि घर के लोगो की नियत दिखने लगी | सब अपना अपना लाभ लेने की कोशिश करने लगे| लडकी के पिता ने दो शादियाॅ हुई थी पहले पत्नी के लडका था कुछ समय बाद अचानक बीमार हो जाने के बाद देहान्त हो गया | कुछ समय बाद दूसरी शादी हुई | उन्होने दो बेटियो को जन्म दिया | करीब शादी के 12-13 वर्ष बाद उन्होने आत्महत्या कर ली और बेटियों को इस हवसी समाज मे छोड कर चल बसी | कुछ समय बाद पिता जी अपनी अय्यासी मे ज्यादा मशगुल रहने लगे | घर की सबसे बडी बहू (चाची) को भी जिस मुददे की तलाश थी वो मिल गया और वो उसका फायदा उठाने लगी | उससे मित्रता करने के एवज में रूपयो की डिमान्ड की और रूपयो के मिलने के बाद कोई दिक्कत ना होने का वादा किया | पर घर के हर सदस्य ने फायदा ढूँढने लगे | भाई ने अपनी हवस का शिकार बना डाला और इज्जत लूटने के बाद भाई ने धमकी दी अगर किसी से कहा तो तुम्हारे बारे झूठा बताकर साबित कर दूगाँ | भाई के द्वारा किये गये घिनौनी हरकत के कारण बहुत ही आहात थी और तबीयत खराब होने के कारण कुछ दिन कालेज नही गयी |चाची ने घर का सारा काम करने के लिये कह कर पड़ोस के घर घूमने चली गी | भाई शहर मे रहकर पढता है वो सुबह शहर चला गया | वह घर पर अकेले काम करने लगी घर पर अकेले होने का फायदा उठा कर छोटे चाचा ने अपना रंग दिखा दिया और उसको चाय देने के लिये कमरे बुलाया | पापा की लाडली बेटी आज नौकरो की तरह हर काम को मजबूर थी कमरे मे चाय देने जाने पर उसे चाय रखकर बैठने के कहा और उसके पुरूष मित्र से बात करने का दबाव देने लगा लडकी के मना किया तो उसके गाल पर चाटा मारा और घर का दरवाज़ा बन्द करके उसके साथ करीब दो घण्टे तक परेशान करता रहा उन पलो का शायद र्जिक मै नही कर सकता |चाची के घर आने पर पता चला तो उल्टे ही आरोप उस पर लगा दिये गये | और अगर इस बात को किसी से कहा तो बदनामी का दाग तुम पर ही लगेगा | और उसका समय समय पर उसका फायदा उठाने लगे भाई की हैवानियत इस कदर हो गयी है कि वह उसे अपनी रखैल कहता है और कुछ समय बाद चाचा की शादी हो गयी |पर उसके बाद भी उसको टार्चर करने लगे | बात ना मानने की वजह से पापा को बडी चाची और छोटे ने मिलकर झूठी कहानी बता दी | अधंकार मे डूबे पिता जी और छोटी बहन ने उनकी झूठी कहानी को सच मान लिया और उसे गलत समझने लगे और अब हालात इस कदर हो गये है कि उनको अपनी बेटी का दर्द ना तो दिखाई देता है और ना ही सुनाई देता है बस रात मे कोई ओछी हरकत ना हो उससे बचने का रास्ता ढूढती है पर हालात इतने बद से बदतर है कि कह नही सकते |शिकायत करने को कहने पर दबे शब्दों मे जो जवाब दिया वो झकझोर देनेे वाला था जो उसने कहा "अब मुझेे किसी से कोई शिकायत नहीं है अब जो थोड़़ा बहुत पापा बात कर लेते है इतना ही बहुत है मै घर के सदस्यों पर कोई शिकायत करके उनकी इज्जत को धूल मे मिलाना चाहती हूॅॅ बस मै भगवान से हर रोज अपनी मौत मांग रही हूॅ मै अब जीना नही चाहती|" उनकी बात जो बुुुुरी लगती उस बात का बदला उनकी कभी रही लाडली बेटी पर अत्याचार करके लेते है और शायद सबसे बदनसीब इन्सान वो है जिसको उस पर हो रहे कृत्यों को बताया होगा और वह उसकी मदद नही कर पाया क्योकि वह सामने आ कर अपने घर वालो की कृत्यों को कहकर अपने पिता का सर नीचा नही होने देना चाहती
अपनी बेबसी पे आज रोना सा आया,
गैरों को नहीं हमने अपनो को आजमाया,
हर किसी की तनहाई को दूर किया लेकिन,
खुद को हर मोड पर तन्हां पाया....
वो दोस्त पुराने नही आते....
उठ जाता हूं..भोर से पहले..सपने सुहाने नही आते..
अब मुझे स्कूल न जाने वाले..बहाने बनाने नही आते..
कभी पा लेते थे..घर से निकलते ही..मंजिल को..
अब मीलों सफर करके भी...ठिकाने नही आते..
मुंह चिढाती है..खाली जेब..महीने के आखिर में..
अब बचपन की तरह..गुल्लक में पैसे बचाने नही आते..
यूं तो रखते हैं..बहुत से लोग..पलको पर मुझे..
मगर बेमतलब बचपन की तरह गोदी उठाने नही आते..
माना कि..जिम्मेदारियों की..बेड़ियों में जकड़ा हूं..
क्यूं बचपन की तरह छुड़वाने..वो दोस्त पुराने नही आते..
बहला रहा हूं बस दिल को बच्चों की तरह..
मैं जानता हूं..फिर वापस बीते हुए जमाने नही आते....!
अपनी बेबसी पे आज रोना सा आया,
गैरों को नहीं हमने अपनो को आजमाया,
हर किसी की तनहाई को दूर किया लेकिन,
खुद को हर मोड पर तन्हां पाया....
वो दोस्त पुराने नही आते....
उठ जाता हूं..भोर से पहले..सपने सुहाने नही आते..
अब मुझे स्कूल न जाने वाले..बहाने बनाने नही आते..
कभी पा लेते थे..घर से निकलते ही..मंजिल को..
अब मीलों सफर करके भी...ठिकाने नही आते..
मुंह चिढाती है..खाली जेब..महीने के आखिर में..
अब बचपन की तरह..गुल्लक में पैसे बचाने नही आते..
यूं तो रखते हैं..बहुत से लोग..पलको पर मुझे..
मगर बेमतलब बचपन की तरह गोदी उठाने नही आते..
माना कि..जिम्मेदारियों की..बेड़ियों में जकड़ा हूं..
क्यूं बचपन की तरह छुड़वाने..वो दोस्त पुराने नही आते..
बहला रहा हूं बस दिल को बच्चों की तरह..
मैं जानता हूं..फिर वापस बीते हुए जमाने नही आते....!
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