वो भी क्या दिन हुआ करते थे जब हर तरफ से खुशहाली ही खुशहाली हुआ करती थी सोचने के लिए सिर्फ एक बात की आज खेलना क्या है और कौन कौन आज नही है तो उसकी कमी उस खेल में सिर्फ दिखती थी बचपन का वो जीवन कितना अच्छा होता है उस का अब सिर्फ एहसास ही बचा है वो भी क्या दिन थे जब सब मिलकर नए नए आविष्कार किया करते थे तरह तरह के खेलो के | मानो अब की तो कुछ हो ही नही पता है ना वो दोस्त रहे और न वो अब हम जिंदगी की दौड़ में अब सब खो से गया है बचपन के जब खेल याद आते है तो बस आँखों मे पानी आ जाता है जैसे हैम लोगो की टोली हुआ करती थी शाम होते ही सब एक जगह इक्कट्ठा होकर खेल खेलतें थे मानो समय ही काम पड़ जाता था कभी कभी में वो लड़ाई आज भी वैसी ही याद आ जाती है जब हम लोग छुपन छुपाई,क्रिकेट,कंचे ,लंबी दौड़, सियर आदि खेल हुआ लड़ते थे बचपन मे सिर्फ दो ही काम एक खेल दूजा पढ़ाई होती थी आज की तरह से जीवन मे तब कोई छह नही हुआ करती थी खेल में बेईमानी की जगह सर्वोपरि होती थी जब हारने लगो तो सिर्फ वो ही रक रास्ता अपनाते थे टी वी सीरियल की तरह लोग की आवाज निकलना दूरसे व्यक्तियों कापी करना सबसे अच्छा लगता था आज ज...