ऐतिहासिक पवित्र तीर्थ स्थल नैमिषारण्य

सीतापुर जिले में ऐतिहासिक पवित्र तीर्थ स्थल नैमिषारण्य दुनिया भर में प्रसिद्ध है। इसे नीमसार के नाम से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि सारे धामों की यात्रा करने के बाद यदि इस धाम की यात्रा न की गई तो आपकी यात्रा अपूर्ण है। इस धाम का वर्णन पुराणों में भी पाया जाता है। नीमसार सीतापुर जिले के एक गांव में है। मान्यता यह है की पुराणों की रचना महर्षि व्यास ने इसी स्थान पर की थी। यह वह जगह है, जहां पर पहली बार सत्यनारायण की कथा हुई थी।ऐसा भी कहा जाता है कि नैमिषारण्य का यह नाम नैमिष नामक वन की वजह से रखा गया है। इस जंगल का भी बड़ा महत्व है। इसके पीछे कहानी ये है कि महाभारत के युद्ध के बाद साधु-संत जो कलियुग के प्रारम्भ के विषय में अत्यंत चिंतित थे, वे ब्रम्हा जी के पास पहुंचे। कलियुग के दुष्प्रभावों से चिंतित साधु-संतों ने ब्रम्हा जी से किसी ऐसे स्थान के बारे में बताने के लिए कहा जो कलियुग के प्रभाव से अछूता रहे। ब्रम्हा जी ने एक पवित्र चक्र निकाला और उसे पृथ्वी की तरफ घुमाते हुए बोले कि जहां भी यह चक्र रुकेगा, वहीं वह स्थान होगा जो कलियुग के प्रभाव से मुक्त रहेगा।
संत इस चक्र के पीछे पीछे आये जो कि नैमिष वन में आकर रुका। इसीलिये साधु-संतों ने इसी स्थान को अपनी तपोभूमि बना लिया। ब्रम्हा जी ने स्वयं इस स्थान को ध्यान योग के लिए सर्वश्रेष्ठ स्थान बताया था। 
प्राचीन काल में 88 हजार ऋषि मुनियों ने इस स्थान पर तप किया था। रामायण में उल्लेख मिलता है कि इसी स्थान पर भगवान श्रीराम ने अश्वमेघ यज्ञ पूरा किया था और महर्षि वाल्मीकि, लव-कुश भी उन्हें यहीं मिले थे। महाभारत काल में यहां पर युधिष्ठिर और अर्जुन भी आये थे। यह एक गोलाकार पवित्र सरोवर है। लोग इसमें स्नान कर परिक्रमा करते हैं। आप इसमें उतर जायें, फिर इसका अदभुत जलप्रवाह आपको अपने आप परिक्रमा कराता है। आपको लगेगा एक चक्कर और लगाया जाये। इसमें चक्रनुमा गोल घेरा है, जिसके अन्दर एवं बाहर जल है। हालांकि नहाने की व्यवस्था चक्र के बाहर ही है। यह अत्यंत प्राचीन मंदिर है। कहते हैं कि भगवान शिव के आदेश से देवासुर संग्राम में असुरों के विनाश के लिए ललिता देवी जी इसी स्थान पर प्रकट हुई थीं। पुराणों में भी ललिता देवी का वर्णन मिलता है। दर्शनार्थी चक्रतीर्थ में स्नान करने के बाद इसी मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं।
मान्यता है कि इसी पावन स्थान पर महर्षि व्यास ने वेद पुराण रचे । इसी स्थान पर 84 हजार साधु-संतों ने तप किया। इसके समीप ही अति प्राचीन वट वृक्ष है।चक्रतीर्थ के ही पास स्थित इस मंदिर में हनुमान जी का मुख दक्षिण की और है। इसलिये इसे दक्षिणेश्वर हनुमान मंदिर भी कहते हैं। यह वृहद आकार की पत्थर की बनी हुई मूर्ति है। हनुमान जी के कन्धों पर राम और लक्ष्मण विराजमान हैं। पाताल लोक में अहिरावण को परास्त करने के बाद हनुमान जी सबसे पहले यहीं पर प्रकट हुए थे। यह किला गोमती नदी के किनारे पर स्थित है। किवंदती के अनुसार, यह किला महाभारत के राजा विराट का था। बनवास के दौरान पांडव यहां रुके थे। कहा जाता है कि अल्लाउद्दीन खिलजी के एक हिन्दू राजा ने इसे पुनर्स्थापित कराया था। हालांकि अब यह किला केवल नाम मात्र का ही रह गया है। एक बड़े से हालनुमा कमरे में एक दीवार पर पांडवों की पत्थर की छोटी-छोटी मूर्तियां स्थापित हैं। 

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